चन्नापट्टना के दरवाज़े
स्त्री — लोककथाएँ और कथा विश्लेषण
चन्नापट्टना के दरवाज़े
1998 में, बंगलौर के दक्षिण में एक कस्बे में, मुसीबत अक्टूबर में शुरू हुई। तीन पुरुष — जवान, अविवाहित, अलग-अलग परिवारों से लेकिन एक ही मोहल्ले से — दो हफ़्तों में नींद में मर गए। कोई बीमारी नहीं। कोई चोट नहीं। डॉक्टरों ने तीनों में हृदयाघात बताया।
चौथा आदमी नहीं मरा। उसे भोर में अपने कमरे के फ़र्श पर बैठा पाया गया, बोलने में असमर्थ, दीवार को घूरता हुआ। तीन दिन बाद जब उसकी आवाज़ लौटी, उसने बस इतना कहा: रात 3 बजे किसी ने उसका दरवाज़ा खटखटाया। एक स्त्री की आवाज़ ने उसका नाम पुकारा। उसकी माँ जैसी लगी। उसने लगभग दरवाज़ा खोल दिया। हाथ कुंडी पर था जब उसने देखा कि उसकी माँ बगल के कमरे में सो रही है।
उसने दरवाज़ा नहीं खोला। फ़र्श पर बैठकर भोर का इंतज़ार किया। सुबह, दरवाज़े पर गेंदे की पंखुड़ियाँ बिखरी थीं। माला नहीं — बस पंखुड़ियाँ, जैसे किसी ने माला निराशा में फाड़ दी हो।
एक हफ़्ते में कहानी पूरे कस्बे में फैल गई। दूसरे हफ़्ते तक, लिखना शुरू हो गया। 'नाले बा' — 'कल आना' — चॉक से हर दरवाज़े पर। फिर अगले मोहल्ले में। फिर अगले में। एक महीने में, कस्बे के हर दरवाज़े पर यह लिखावट थी।
तर्क सरल और भयावह था। भूत, वे कहते थे, पढ़ सकता था। वह बुद्धिमान था। दरवाज़े पर आता, लिखावट देखता, और देरी स्वीकार करता। कल आएगा। लेकिन कल भी लिखावट वहीं होती। 'कल आना।' हमेशा कल। यह जाल था, और समुदाय ने मिलकर बनाया था।
बाज़ार में एक बूढ़ी औरत ने बंगलौर से आए पत्रकार को समझाया। 'वह बुरी नहीं है,' बूढ़ी ने कहा। 'वह गुस्से में है। किसी ने उसके साथ कुछ किया, और वह उन आदमियों को ढूँढ रही है। लेकिन सही वाले नहीं मिलते, तो दरवाज़े-दरवाज़े जाती है। लिखावट उसे रोकती नहीं। बस देर करती है। और हमारे पास बस देरी है।'
पत्रकार ने पूछा: 'वह कौन थी? उसके साथ क्या हुआ?'
बूढ़ी ने उसे ध्यान से देखा। 'तुम गलत सवाल पूछ रहे हो। सवाल यह नहीं कि वह कौन थी। सवाल यह है: उसके साथ क्या किया गया? और उस सवाल का जवाब ही है कि इस कस्बे का हर आदमी अपना दरवाज़ा खोलने से क्यों डरता है।'
'नाले बा' लिखावट महीनों जारी रही। मौतें रुक गईं। चॉक हर हफ़्ते ताज़ा किया जाता — एक सामुदायिक अनुष्ठान, बिना संगठन, बिना नेतृत्व। हर परिवार अपना दरवाज़ा सँभालता। और हर सुबह, कस्बा जाँचता: लिखावट अभी भी है? किसी ने दरवाज़ा तो नहीं खोला?
कोई नहीं बताता वह कौन थी। इसलिए नहीं कि नहीं जानते। क्योंकि जानने का मतलब यह मानना होगा कि क्या किया गया। और दरवाज़ों पर लिखावट — 'कल आना, कल आना, कल आना' — सच से आसान है।
स्त्री क्या है?
स्त्री (स्त्री) भारतीय लोककथाओं का प्रतिशोधी स्त्री भूत प्रतिमान है — एक ऐसी स्त्री जिसके साथ जीवन में अन्याय हुआ (हत्या, विश्वासघात, परित्याग, उत्पीड़न) जो मृत्यु के बाद उन पुरुषों से न्याय लेने लौटती है जिन्होंने उसे नष्ट किया। वह किसी विशिष्ट ग्रंथ की विशिष्ट सत्ता नहीं है। वह एक पैटर्न है — पूरे भारत का सबसे बार-बार दोहराया जाने वाला, सबसे भयंकर, सबसे सांस्कृतिक रूप से गहराई से जड़ा भूत-प्रकार। हर गाँव में एक संस्करण है। हर परिवार में एक कहानी है।