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साहित्यपुरनानूरु (संगम संकलन, लगभग 300 ई.पू. – 300 ई.)मूल और निश्चित स्रोत। पेय् युद्ध के बाद के दृश्य का वर्णन करने वाली अनेक कविताओं में दिखता है। ये भय कथाएँ नहीं — उच्चतम कोटि की युद्ध कविताएँ हैं।
साहित्यशिलप्पतिकारम (इलंगो अडिगल, लगभग दूसरी सदी ई.)महान तमिल महाकाव्य में दिव्य क्रोध और रणभूमि के बाद के वर्णनों में पेय् के संदर्भ हैं।
फ़िल्मतमिल हॉरर सिनेमाआधुनिक तमिल में 'पेय्' शब्द भूत का सामान्य शब्द बन गया है, और दर्जनों तमिल भय फ़िल्मों में 'पेय्' शीर्षक में है। हालाँकि, अधिकतर सामान्य भूत दर्शाते हैं, संगम साहित्य का विशिष्ट रणभूमि-भक्षक नहीं।
टेलीविज़नपौराणिक धारावाहिकपुराणिक कथाओं के तमिल टेलीविज़न रूपांतरणों में कभी-कभी काली या दुर्गा की अनुचर आत्माओं के रूप में पेय् दर्शाया जाता है।
संदर्भ पुस्तकGhosts, Monsters and Demons of India — राकेश खन्नाभारतीय अलौकिक सत्ताओं के व्यापक वर्गीकरण में पेय् का प्रलेखन।

सटीकता: साहित्य में अत्यधिक सटीक · आधुनिक प्रयोग में पतला

कला इतिहास में पेय्

संगम काल (लगभग 300 ई.पू. – 300 ई.) — साहित्यिक चित्रण: पेय् के सबसे पुराने और सबसे शक्तिशाली चित्रण साहित्यिक हैं, दृश्य नहीं। पुरनानूरु संकलन में रणभूमियों पर नाचते, रक्त पीते पेय् के जीवंत वर्णन हैं। ये भय कथाएँ नहीं — उच्चतम साहित्यिक कोटि की युद्ध कविताएँ हैं।

पल्लव और चोल मंदिर (7वीं–13वीं सदी ई.): तमिलनाडु में मंदिर की मूर्तियाँ युद्ध और दिव्य संघर्ष के दृश्यों में भयंकर, क्षीण आकृतियाँ दर्शाती हैं। महाबलीपुरम की नक्काशियाँ और बाद के चोल-काल के मंदिरों में दुर्गा/कोर्रवई की अनुचर आकृतियाँ संगम वर्णनों से मेल खाती हैं।

अम्मन और काली मंदिर प्रतिमा-विधान: तमिलनाडु भर के ग्रामीण अम्मन मंदिरों में, उग्र देवी के चारों ओर अनुचर आत्माएँ — भूत और पेय् — अंधेरे, कंकाल-रूपी नर्तकों के रूप में दर्शाई जाती हैं।

भौतिक प्रमाण: पेय् ऐसे साहित्य में प्रलेखित है जो दो हज़ार से अधिक वर्षों से जीवित है और ऐसी मंदिर नक्काशियों में जो एक सहस्राब्दी से अधिक समय से टिकी हैं। ये मौखिक कहानियाँ नहीं — पत्थर में उकेरी और ताड़पत्रों पर लिखी गई हैं।

क्षेत्रीय संबंध

पिशाच · वेताल · भूत · राक्षस · डाकिनी

वैश्विक समकक्ष: विश्व लोककथाओं में सबसे निकटतम समानांतर अरबी परंपरा का ग़ूल (al-ghul) है — कब्रिस्तान में रहने वाली, मृतकों को खाने वाली सत्ता। दोनों शव-भक्षक हैं, दोनों मृत्यु स्थलों पर रहते हैं। मुख्य अंतर: ग़ूल अकेला दुबका रहता है। पेय् झुंड में नाचता है। ग़ूल चोरी-छिपे है। पेय् आनंदित है। पेय् को जो करता है उसमें कोई शर्म नहीं — वह नृत्य और हँसी से भोज मनाता है।