कालना की हिल्सा

मेछो भूत — लोककथाएँ और कथा विश्लेषण


कालना की हिल्सा

कालना के पास, भागीरथी नदी के किनारे एक गाँव में शोभा नाम की एक विधवा रहती थी जो तीन गाँवों में अपनी मछली करी के लिए मशहूर थी। कोई साधारण मछली करी नहीं — उसकी इलिश माछ, सरसों की चटनी में पकी हिल्सा, ऐसी थी कि झगड़े खत्म कर दे, दोस्तियाँ जोड़ दे, बड़े-बड़े आदमी कृतज्ञता से रो पड़ें।

शोभा हर मंगलवार और शुक्रवार कालना बाज़ार से मछली खरीदती। वह बहुत नखरे वाली थी। हर हिल्सा को खुद जाँचती — पेट दबाकर कसावट देखती, आँखें देखती, गलफड़े सूँघती। जितनी खरीदती उससे ज़्यादा वापस कर देती।

भाद्र महीने में मुसीबत शुरू हुई, जब इलिश का मौसम चरम पर होता है। शोभा ने एक शानदार हिल्सा खरीदी — मोटी, चाँदी जैसी, नदी से ताज़ी। उसने घर लाकर रसोई की अलमारी पर रखी, गीले कपड़े से ढँकी, और सरसों पीसने गई।

जब लौटी, मछली गायब।

कपड़ा नहीं। केले का पत्ता नहीं। बस मछली। गायब। उसने रसोई, आँगन, नाली खोज डाली। कुछ नहीं। एक शल्क नहीं। बिल्ली — एक मोटा नारंगी नर जिसका नाम राजा था, हमेशा पहला संदिग्ध — बरामदे में सो रहा था।

शोभा गुस्सा थी पर व्यावहारिक। वापस बाज़ार गई। दूसरी हिल्सा खरीदी — पहली जैसी बढ़िया नहीं, पर ठीक। घर लाई, अलमारी पर रखी, और इस बार रसोई के दरवाज़े पर बैठकर नज़र रखी।

एक घंटे कुछ नहीं हुआ। फिर उसने महसूस किया — हवा में एक नमी, जैसे नदी खुद उसकी रसोई में रेंग आई हो। कच्ची मछली की गंध, तेज़ होती जा रही। और आँख के कोने से उसने देखा — एक हाथ — पीला, पतला, पानी से टपकता — मिट्टी के चूल्हे के पीछे से बढ़ा और हिल्सा को पकड़ लिया।

शोभा चीखी नहीं। उसने भारी लोहे की झारा — वह मछली पलटने वाला कड़छा जो हर बांग्ला रसोई में होता है — उठाया और हाथ पर दे मारा। हाथ हटा। मछली गिरी। और चूल्हे के पीछे से एक आवाज़ आई, बहुत साफ़ और बहुत उदास: 'दीदी, बस एक टुकड़ा? सरसों की चटनी की खुशबू बहुत अच्छी आ रही थी।'

उसने चूल्हे के पीछे की जगह को घूरा। कोई नहीं था। लेकिन दीवार गीली थी, और ज़मीन पर पानी की लकीर खिड़की से होते हुए नदी की ओर जाती थी।

शोभा ने गाँव को बताया। बुज़ुर्गों ने सिर हिलाया। वे जानते थे यह क्या है। एक मेछो भूत — शायद बूढ़े कार्तिक-दा का भूत, वह मछुआरा जो तीन बरसात पहले भागीरथी में डूब गया था और जो ज़िंदगी में ज़िले का सबसे बेशर्म मछली चोर था। ऐसा लगा, मौत ने भी उसकी यह आदत नहीं छुड़ाई।

समाधान पूरी तरह बंगाली था। शोभा ने हर शाम अपनी रसोई की खिड़की के बाहर केले के पत्ते पर मछली का एक छोटा टुकड़ा — बस पूँछ, कुछ बड़ा नहीं — रखना शुरू कर दिया। चोरियाँ बंद हो गईं। मेछो भूत ने उस चढ़ावे को उसी शांत गरिमा से स्वीकारा जैसे कोई नियमित ग्राहक जिसे उसकी पसंदीदा मेज़ मिल गई हो।

सालों बाद, शोभा के पड़ोसियों की भी कभी-कभी मछली गायब हो जाती — एक रोहू यहाँ, एक कतला वहाँ, हमेशा सबसे अच्छा टुकड़ा, हमेशा बंद रसोई से। वे आह भरते, एक पूँछ का टुकड़ा रख देते, और वापस सो जाते। 'कार्तिक-दा फिर भूखे हैं,' वे कहते, उसी विरक्त स्नेह से जो बंगाली उन रिश्तेदारों के लिए रखते हैं जो बिना बुलाए आ जाते हैं लेकिन जिन्हें आप भगा भी नहीं सकते।

मेछो भूत क्या है?

मेछो भूत (মেছো ভূত) बांग्ला लोककथाओं का एक ऐसा भूत है जिसका पूरा अस्तित्व एक जुनून के इर्द-गिर्द घूमता है: मछली। नाम ही सब कहता है — 'मेछो' का अर्थ है 'माछ' (मछली) और 'भूत' — यानी शब्दशः मछली का भूत। यह मछली बाज़ारों, रसोइयों, नदी किनारों और तालाबों में भटकता है। यह मछली चुराता है। बस यही करता है। बस इतना ही करता है।